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द गा़जी अटैक को बॉलीवुड की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ युद्ध फिल्म कहा जा सकता है। फिल्म नाटकीय जरूर है, लेकिन है कसी हुई और तकनीकी रूप से सक्षम। विश्वास नहीं होता कि यह इसके निर्देशक की पहली फिल्म है। हकीकत, लक्ष्य, एलओसी कारगिल, 1971, बार्डर जैसी कई फिल्में आई, लेकिन समुद्र के भीतर की हलचल पर ऐसी युद्ध फिल्म बॉलीवुड में कभी नहीं बनी। युद्ध केवल जमीन और आकाश पर ही नहीं लड़े जाते। गहरे समुद्र में भी हमारे नोसैनिक सीमाओं की निगरानी करते है, तभी हम चैन से सो पाते है। फिल्म का एक दृश्य है, जिसमें बांग्लादेशी शरणार्थी तापसी पन्नू नौसैनिक को उसके पिता बनने पर बधाई देती है और कहती है कि वह बच्चा निश्चित ही बहुत लकी है, क्योंकि वह सीमा के उस पार (भारत में) पैदा हुआ।

रईस में नवाजुद्दीन सिद्दीकी शाहरुख खान से ज्यादा छाए रहे। जितनी तालियां शाहरुख की एंट्री पर बजी, वैसी ही तालियां नवाजुद्दीन सिद्दीकी की एंट्री पर भी बजती हैं। फिल्म में कुछ वनलाइनर बड़े जोरदार है जैसे - "कोई धंधा छोटा नहीं होता, और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।" -"हरेक का अपना-अपना धंधा होता है, जैसे पुलिस का अपना धंधा है, वैसी ही तस्करों का अपना धंधा है।" फिल्म में शाहरुख खान कई डायलॉग पर वाह-वाही लूट ले जाते है। जैसे- "मैं धर्म का धंधा नहीं करता" और लोगों के दिन और हफ्ते होते है, लेकिन शेरों का जमाना होता है।

काबिल कोई प्रेम कहानी नहीं है। यह बदले की आग में झुलसते एक दृष्टिबाधित डबिंग आर्टिस्ट की कहानी है। जो अपनी पत्नी के बलात्कारियों को खुद सजा देता है, क्योंकि कानून उसकी मदद नहीं कर पाता। बदले की भावना को लेकर कई फिल्में बनी है और यह फिल्म भी खून भरी मांग और करन-अर्जुन जैसी बदले की भावना वाली फिल्में बनाने वाले राकेश रोशन की फिल्म है। कोई इसे हॉलीवुड की ब्लाइंड फ्यूरी फिल्म से और कोई इसे कोरियन फिल्म ब्रोकन से प्रेरित बताता है। निर्देशन संजय गुप्ता को एक्शन फिल्में बनाने का अच्छा अनुभव है और राकेश रोशन कामर्शियल प्रोड्यूसर है ही।

दंगल फिल्म कुश्ती के बारे में तो है ही, महिला सशक्तीकरण के बारे में भी है। यह एक पिता और उसकी पुत्रियों का संघर्ष भी है और अहम का टकराव भी। इमोशनल सीन वाकई भावुक कर देते है और कॉमेकि सीन हंसाते है। फिल्म में रेसलिंग के बारे में बारीक बातें इस तरह से पहले ही बता दी गई कि समझने में दर्शकों को तकलीफ न हो। पौने तीन घंटे की दंगल मनोरंजन का कोई पहलू नहीं छोड़ती और संदेश भी दे जाती है।

‘ओके जानू’ बड़े सितारों की साधारण फिल्म है। मणि रत्नम की तमिल फिल्म ओके कलमनी का यह हिन्दी रीमैक है। गुलजार के गाने, एआर रहमान का संगीत, निर्माता की जगह मणि रत्नम का नाम, कलाकारों में नसीरुद्दीन शाह, लीला सेमसेन, कीट्टू गिडवाणी के साथ ही आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर का अभिनय, अरिजीत सिंह का गायन आदि होने के बाद भी फिल्म औसत ही कहीं जाएगी। मल्टीप्लेक्स आने वाले दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई इस फिल्म को महानगर के युवा वर्ग द्वारा पसंद किया जाएगा, हालांकि इसमें कोई नवीनता नहीं है।

ऊल जलूल मनोरंजन की फिल्म है बेफिक्रे ! आजकल के बेपरवाह युवकों के लिए यह पैसा वसूल टाइप. फिल्म में कहानी वगैरह बकवास है. वगैरह में आप डॉयलाग, गानों, कॉमेडी को हैं। यह एक रोमांटिक फैंटेसी है जिसमें खुलकर किस विस होते हैं, मोहब्बत में वफ़ा तो अब 90 के दशक की बात रह गई है। अब तो फ़ास्ट फ़ूड की तरह फास्ट रोमांस, गाने और पकड़म पाटी होती है. तर्क और दिमाग के लिए इसमें जगह कम है। अब प्रेम के लिए मिलने की बात नहीं होती, संबंधों के लिए होती है। इस फिल्म में साड़ी पवित्रता कपड़ों के साथ उतरती रहती है. हीरो अंडरवियर में, और हीरोइन बिकिनी में ! इस फिल्म में हीरो और हीरोइन दोनों की ही जबान और कपड़े बार बार फिसलते रहते हैं और बेचारा मल्टीप्लेक्स में बैठा दर्शक चाहकर भी सीटी नहीं बजा पाता और अंत में कुंठित होकर बाहर निकलता है।