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ट्यूबलाइट मजेदार फिल्म है। आप इसे सपरिवार देख सकते हैं। 100-200 रुपए खर्च करके जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलेंगे, तब आपमें सकारात्मकता का भाव होगा। आजकल की फिल्मों में यहीं तो नहीं होता। अपराधियों, तस्करों, गुण्डों, नेताओं, आवारा युवाओं पर फिल्में बनती है और समीक्षक बहुत सितारे बांटते हैं, लेकिन दर्शक को कुछ याद नहीं रहता। खलीज टाइम्स, गल्फ न्यूज और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबारों ने इस फिल्म को इमोशन का ओवरडोज बताते हुए 2-3 स्टार ही दिए हैं। अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों को फिल्म के क्रॉफ्ट से ज्यादा मतलब होता है, उसकी कहानी और इमोशन से नहीं। इसलिए अगर वे इसे दोयम फिल्म कहें, तो मान लीजिए कि यह फिल्म शानदार है।

फिल्म बैंक चोर विजय माल्या के बारे में नहीं है, न ही यह चौधरी या दूसरे बैंक चोरों के बारे में है। फिल्म का प्रचार जितने दिलचस्प तरीके से किया गया था, पूरी फिल्म वैसी दिलचस्प नहीं है। फिल्म का कुछ हिस्सा ही प्रहसनात्मक है और गुदगुदी पैदा करता है। रहस्य, रोमांच डालने के चक्कर में फिल्म की कॉमेडी पीछे रह जाती है। फिल्म देखने पर समझ में आता है कि कॉमेडियन कपिल शर्मा ने साइन करने के बाद भी चम्पक का रोल करने से क्यों मना कर दिया, जो बाद में रितेश देशमुख के मत्थे आया।

फिल्म बैंक चोर विजय माल्या के बारे में नहीं है, न ही यह चौधरी या दूसरे बैंक चोरों के बारे में है। फिल्म का प्रचार जितने दिलचस्प तरीके से किया गया था, पूरी फिल्म वैसी दिलचस्प नहीं है। फिल्म का कुछ हिस्सा ही प्रहसनात्मक है और गुदगुदी पैदा करता है। रहस्य, रोमांच डालने के चक्कर में फिल्म की कॉमेडी पीछे रह जाती है। फिल्म देखने पर समझ में आता है कि कॉमेडियन कपिल शर्मा ने साइन करने के बाद भी चम्पक का रोल करने से क्यों मना कर दिया, जो बाद में रितेश देशमुख के मत्थे आया।

जो फिल्म पत्रकार खूब चर्चा कर रहे थे कि बेवॉच में प्रियंका चोपड़ा कयामत ढा देंगी, उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी होगी, क्योंकि इसमें प्रियंका ने कयामत जैसा तो कोई काम किया नहीं। जिस तरह के बोल्ड अवतार (अवतार फिल्मी भाषा है, वरना अवतार तो देवी-देवताओं के होते हैं) में प्रियंका नजर आई है, उससे ज्यादा बोल्ड तो वे हिन्दी की उनकी पहली फिल्म ऐतराज में थीं। हॉलीवुड के समीक्षकों ने पिछले हफ्ते रिलीज होते ही काफी नकारात्मक समीक्षाएं लिखी थीं, यह शायद उसी का असर है कि दुनियाभर में इस फिल्म को जितना अच्छा रिस्पांस मिलने की उम्मीद थी, वह धराशायी हो गई। हां, यह बात जरूर है कि इस फिल्म में प्रियंका चोपड़ा मुख्य खलनायक के किरदार में है। कहा जा सकता है कि प्रियंका का रोल इस फिल्म में दूसरे नंबर का सबसे महत्वपूर्ण रोल है। महिला कलाकारों को मुख्य खलनायक का किरदार कम ही मिलता है। फिल्म के पर्दे पर प्रियंका नजर आ रही हो या नहीं आ रही हो। उनका रोल विक्टोरिया लीड्स जरूर नजर आता है। पर्दे पर खलनायक की जगह खलनायिका हो और ऐसी खलनायिका जो मिस वल्र्ड रह चुकी हो, तो उसके प्रचार की संभावनाएं काफी अच्छी होती हैं।

राब्ता देखकर लगता है कि कुछ फिल्में केवल इंटरवल तक ही बननी चाहिए। उसके बाद फिल्म देखने के लिए दर्शकों को फीस का पेमेंट लाजिमी है। राब्ता के बारे में यहीं कहा जा सकता है। प्रेम कहानी और पुर्नजन्म को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन इतनी भंकस फिल्म शायद ही कोई हो। मधुर गाने भी जिस परिस्थिति में दिखाए गए है, उससे लगता है कि ये गाने तो एफएम पर ही अच्छे लगते हैं। गाने और चित्रण का कुछ तालमेल तो होना चाहिए। प्रेम कहानी में ऐसे डायलॉग भी अच्छे नहीं लगते जैसे इस फिल्म में है - ‘लड़कियों को बंगला चाहिए, न की कंगला’, ‘लड़की हीरो पर नहीं, हीरे पर मरती है’ और ‘जो लड़ सकते है, वे ही प्रेम कर सकते हैं’ आदि। एक और डायलॉग है - ‘लड़ाइयां सिर्फ लड़ी नहीं जाती, खेली भी जाती हैं’। फिल्मकार शायद प्रेम को भी लड़ाई या खेल समझता है।

सचिन - ए बिलियन ड्रीम्स में नई बात कुछ भी नहीं है, लेकिन फिर भी फिल्म इतने दिलचस्प तरीके से बनाई गई है कि आप उसे कितनी भी बार देख सकते हैं। सिनेमा हॉल में जब फिल्म समाप्ति पर दर्शक तालियां बजाकर फिल्म की तारीफ करते हैं, तब कुछ अलग ही एहसास होता है। यहीं एहसास अमिताभ बच्चन को हुआ होगा, जो उन्होंने ट्वीट किया - हम उस देश के वासी है, जिस देश में सचिन रहता हैं। सिनेमा हॉल में दर्शक वर्ग पर नजर डालो, तो उसमें हर आयु वर्ग के लोग नजर आते है। कोई पोता अपने दादा के साथ आया है, तो 4-5 बहन-भाई गर्मी की छुट्टियों में फिल्म का आनंद ले रहे है। सचिन के बारे में शायद ही कोई ऐसी बात हो, जो लोग नहीं जानते हो, लेकिन फिर भी बड़े पर्दे पर उन्हें देखना एक अलग ही एहसास है। आप क्रिकेट के शौकीन हो या न हो, सचिन के फैन हो या न हो, फिल्म आपको पसंद आएगी।