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अगर आप टीवी पर गुरमीत और हनीप्रीत को झेल सकते हैं, कपिल शर्मा के शो को देख सकते हैं, तो जुड़वा-2 आपको अच्छी लगेगी। तर्कहीनता, छिछोरेपन और बेअक्ली भी मनोरंजक हो सकती है। यह फिल्म डेविड धवन ने अपने बेटे वरुण को स्थापित करने और नोट कमाने के लिए बनाई है। चाहे तो इसमें योगदान दें और रोहिंग्या मुसलमान, नोटबंदी, यशवंत सिन्हा के इंटरव्यू आदि के तनाव दूर करें। दिमाग को सिनेमाघर के बाहर रखें, खाली मगज जाएं, ठहाके लगाएं, अक्लमंदी भरी मूर्खताओं देखें और चले आएं।

‘भूमि’ देखकर लगता है कि संजय दत्त जेल से नहीं छूटते तो ही बेहतर था। क्या ऐसी ही फिल्म में काम करना था? फिल्म में कोई नयापन नहीं है, पुरानी कहानी है। कुछ समय पहले आई मातृ और मॉम में बेटी से हुए अन्याय का बदला मां लेती है, इसमें बेटी के साथ हुए अन्याय का बदला पिता और बेटी मिलकर लेते है। संजय दत्त को फिर से स्थापित करने के लिए बनाई गई फिल्म में उन्होंने भावुकता से भरे दृश्य और मार-धाड़ वाले सीन अच्छे किए है। निर्माता को विश्वास नहीं था कि फिल्म चल भी सकती है। इसीलिए सनी लियोन की मदद ली गई है। संजय दत्त के फैन इस फिल्म को देखकर माथा कूटेंगे।

पोंटी चड्डा की कंपनी अरूण गवली पर ही फिल्म बना सकती है, मदर टेरेसा पर तो नहीं। अगर अरूण गवली और उसकी पूरी गुंडा फौज आकर बंदूक की नोक पर फिल्म देखने के लिए कहे, तो भी मना कर दीजिए। फिल्म में अरूण गवली का महिमामंडन शर्मनाक है। उसे झेलना बेहद कठिन है। 80 और 90 के दशक में जब गवली की डगड़ी चाल मुंबई के अखबारों में सुर्खियां बनाया करती थी, उन्हीं दिनों मैं भी मुंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में पत्रकार था। इसीलिए दावे से कह सकता हूं कि यह फिल्म भायखला के सात रास्ता इलाके की डगड़ी चाल के बारे में जिस तरह छवि बनाती है, वह सही नहीं है। अरूण गवली मवाली, हफ्ता वसूली करने वाला गुंडा, नशेड़ी, गैंगस्टर, अपराधी व्यक्ति रहा है। जिसने अपराधों के सहारे राजनीति में घुसने की कोशिश की। फिल्म में अरूण गवली को वाल्मीकि दिखाने की कोशिश की गई है, जो हास्यास्पद है।

पुरानी फिल्मों में हीरो का नाम राज और विलेन का नाम डीके टाइप होता था। ‘अ जेंटलमैन’ के निर्देशकों में राज और डीके का नाम है। अगर टाइम पास करने के लिए अ जेंटलमैन देखने चले गए हैं, तो उसे आसानी से भूल भी सकते है। मसाले से भरपूर यह फिल्म तीन दूसरे फिल्मों के साथ लगी है, लेकिन ज्यादा स्क्रीन यही शेयर कर रही है। एक्शन से भरपूर अ जेंटलमैन में रोमांस, खूबसूरत लोकेशन्स और नाच-गाना भी है। फॉर्मूले वहीं पुराने है। अनाथ हीरो, देशद्रोही खलनायक, बड़े पैमाने पर किकबैक की राशि, किकबैक के सबूत वाली हार्ड ड्राइव, सर्वर में सबूत, एनएसए की तरह एनएससी, हीरो का शरीफ की तरह जीवन बिताने का इरादा और उसके पीछे पड़ा खलनायक। मुंबई, गोवा, मियामी आदि के खूबसूरत दृश्य। खेल खत्म मैगी-नूडल्स हजम।

इंदु सरकार के बाद बादशाहो इमर्जेंसी के बैकड्रॉप पर आधारित एक्शन-ड्रामा फिल्म है। जो बताती है कि संजय गांधी दुष्चरित्र थे और प्रीवी पर्स खत्म होने के बाद वे राजाओं के निजी खजाने को लूटकर इकट्ठा कर रहे थे। आपत्तिजनक बात यह है कि इसमें सेना को नीच हरकतें करते हुए दिखाया गया है। कथानक के अनुसार इमर्जेंसी में न केवल पुलिस, बल्कि फौज भी संजय गांधी के इशारे पर चापलूसों की तरह काम करती थी। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को नेताओं की जी-हुजूरी करते हुए दिखाया गया है, जो पचता नहीं। मनोरंजन के नाम पर लोग शायद इसे झेल लें। रेस फिल्म की याद दिलाने वाली इस फिल्म में भी धोखा, छल, फरेब, झूठ, मक्कारी, चापलूसी, राजशाही की वफादारी, प्यार-मोहब्बत, नफरत सभी कुछ है। हर तरह का मसाला इस फिल्म में है। कसूरी मैथी से लेकर जावित्री तक और कलौंजी से लेकर पत्थर फूल तक। बोनस में सनी लियोनी भी है।

अक्षय कुमार की संडास वाली लव स्टोरी दर्शकों को भरमाती है। फिल्म कहती है कि गांवों में लोग लोटा पार्टी करने इसलिए जाते है कि वे रूढ़ियों से बंधे है। फिल्म के अनुसार जो लोग दिसा मैदान को खुले में जाते हैं, वे ऐसा अपनी मर्जी से कर रहे हैं। फिल्म यह नहीं बताती कि भारत में एक तिहाई परिवार जिन घरों में रहते है, वे 258 वर्गफुट से भी कम के है और उन घरों में औसतन पांच लोग रहते है। एक व्यक्ति के लिए औसतन 60 वर्गफुट जगह भी उपलब्ध नहीं है। अमेरिका में जेल के कैदियों के लिए भी न्यूनतम 60 वर्गफुट जगह उपलब्ध कराई जाती है। अनेक गांव ऐसे है, जहां की महिलाएं दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाती है। ऐसे गांव में अगर शौचालय बना भी दिए जाए, तो लोग उसका उपयोग नहीं कर पाएंगे। खैर, यह फिल्म है और फिल्म का मतलब है बिजनेस। सामान्य से डेढ़ गुना महंगा टिकिट लेकर मल्टीप्लेक्स में जो लोग टॉयलेट देखने जा रहे है, उनके लिए यह कोई समस्या नहीं है। टॉयलेट न होना, उनके लिए मनोरंजन की बात हो सकती है।