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‘जब हैरी मेट सेजल’ शाहरुख खान की सर्वश्रेष्ठ फिल्म नहीं है और न ही अनुष्का की। इम्तियाज अली की भी नहीं। फिल्म शुरू होते ही समझ में आ जाता है हरिन्दर सिंह मेहरा उर्फ हैरी की सेजल जवेरी से शादी होगी। भारत में शादी ब्याह की फिल्में खूब चलती है। अगर फिल्म के नाम में दुल्हन या दुल्हनिया जैसे शब्द आ जाए, तो एक बड़ा वर्ग उसे देखने पहुंच जाता है। वैसे भी यह फिल्म एनआरआई लोगों के लिए बनी है, इसीलिए इसका हीरो पंजाबी और हीरोइन गुजराती है। ये दोनों ही कम्युनिटी विदेश में बहुलता से है।

‘इंदु सरकार’ इंदिरा गांधी पर नहीं, इमरजेंसी के बैकड्रॉफ्ट में सरकारी अफसर नवीन सरकार और उसकी बीवी इंदु सरकार के अंतद्र्वंद की कहानी है। बीच-बीच में इमरजेंसी की घटनाएं याद की गई हैं। इमरजेंसी के काले दिनों की कच्ची कहानी इस फिल्म में है। तुर्कमान गेट कांड, नसबंदी, प्रेस सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी पर नियंत्रण, आरएसएस के कार्यालयों में छापे, 20 सूत्रीय कार्यक्रम, युवक कांग्रेस के पांच सूत्र आदि इस फिल्म में है।

'विजुअल गाली!' फिल्म के प्रचार के लिए कलाकारों द्वारा दिए गए फोटोशूट।
‘लिपस्टिक अंडर माय बुरखा’ कैसी फिल्म होगी, इसका अंदाज उसे प्रचारित करने के लिए फिल्म की नायिकाओं की फूहड़ भावभंगिना वाले फोटोशूट काफी है। फिल्म को एक दर्जन से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके है। एक साल से भारत में इसका प्रदर्शन अटका पड़ा था। अब सेंसरबोर्ड ने ए सर्टिफिकेट देकर पास किया, तो इसे सिनेमाघर मुश्किल से मिल रहे है। भोपाल की हवाई मंजिल में रहने वाली चार महिलाओं की दमित इच्छाओं की कहानी है यह फिल्म। फिल्म से ज्यादा यह एक नाटक की तरह लगती है।

इंग्लिश-विंग्लिश के बाद मॉम श्रीदेवी की ऐसी फिल्म है, जिसकी कहानी श्रीदेवी के लिए ही लिखी गई है। श्रीदेवी जानती हैं कि उम्र के इस मोड़ पर उन्हें कैसी फिल्में करनी है। कई अभिनेत्रियां यह बात बुढ़ापे तक नहीं समझ पाती। एक स्कूल टीचर, एक मां और प्रतिशोध लेने वाली औरत के रूप में उन्होंने शानदार एक्टिंग की है। फिल्म में उनकी बेटी बनी पाकिस्तानी कलाकार सजल अली सचमुच में उनकी बेटी जैसी ही लगती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने भी प्राइवेट डिटेक्टिव डी.के. के रूप में अच्छा अभिनय किया है और क्राइम ब्रांच के अधिकारी बने अक्षय खन्ना ने भी अपने रोल के साथ न्याय किया है। बदले की कहानी पर बनी हुई फिल्में हिन्दी के दर्शक हमेशा से पसंद करते आए है। यह फिल्म भी दर्शकों को पसंद आएगी।

रणबीर कपूर बॉलीवुड के पप्पू हैं। उनकी फिल्म जग्गा जासूस देखने की मिस्टेक गलती से भी न करना, वरना ‘सिर में हेडेक’ तय है। लगता है अनुराग बसु कपूर खानदान से कोई पुरानी दुश्मनी निकाल रहे हैं। तीन साल तक फिल्म अटकाई, रणबीर से पैसे भी लगवाए और रोल ऐसा दिया, जिसमें वह पूरी तरह ‘उल्लू का पट्ठा’ है। रणबीर और कैटरीना की जोड़ी लोगों को अजब प्रेम की गजब कहानी की याद दिलाती है, लेकिन इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है। दोनों के निजी रिश्तों का असर भी इस फिल्म में है, जिसमें उनकी केमेस्ट्री ही गड़बड़ है। बची-खुची कसर कहानी और निर्देशन में पूरी कर दी। अनुराग बसु की मेहरबानी रही कि इस फिल्म में 29 गानें नहीं है, जैसी की अफवाह थी। फिल्म का हकला हीरो हर बात कहने के लिए अपने दिमाग के दाएं हिस्से का उपयोग करता है, जो रचनात्मक कामों के लिए है। हकलाहट से बचने के लिए वह हर संवाद गाकर बोलता है। उसकी देखादेखी हीरोइन भी गाकर डायलॉग बोलने लगती है। 5-10 मिनिट के ऐसे दृश्य झेले जा सकते थे पर पूरी फिल्म में यह सब झेल लेना कोई आसान नहीं।

इस साल के पूवार्ध की वाहियात फिल्मों में से एक है ‘एक हसीना थी, एक दीवाना था’। सुनील दर्शन इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक, लेखक, स्क्रीप्ट राइटर आदि-आदि है और उनका छोरा शिव दर्शन इसका हीरो है। यह फिल्म दर्शकों के बजाय ‘दर्शनों’ के लिए है। तड़ीपार नदीम सेफी ने इसमें म्युजिक दिया है। जिन पर 1997 में गुलशन कुमार की हत्या का आरोपी होने का मामला था। श्रवण राठौर के साथ उनकी जोड़ी नदीम श्रवण ने अच्छे-अच्छे गाने दिए थे। वे संगीतकार अब भी अच्छे है और इस फिल्म का संगीत मधुर है। पलक मुछाल की आवाज भी इस फिल्म में है।