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आज नई और पुरानी, हिन्दी और अंग्रेजी की कुल 8 फिल्में लगी हैं। मैंने मुक्ति भवन को चुना। इसका कारण यह था कि यह मंजे हुए कलाकारों की गैर व्यावसायिक फिल्म है। इसमें ग्लैमर, कॉमेडी, एक्शन, सेक्स, रोमांस आदि का कोई तड़का नहीं है, बल्कि यह फिल्म मृत्यु को लेकर है। जो कि शाश्वत है। 99 मिनिट की फिल्म के आइनॉक्स में केवल दो शो थे। सिनेमा हॉल में मेरे अलावा तीन और दर्शक मौजूद थे। शायद वे भी शाश्वत की तलाश में आए थे।

नाम शबाना का केवल नाम ही अच्छा है। इसमें ज्यादातर कलाकार स्पेशल अपीयरेंस में है। अक्षय कुमार, अनुपम खेर, डेनी, मुरली शर्मा आदि प्रमुख कलाकार छोटे-छोटे से रोल में है। मनोज वाजपेयी का रोल थोड़ा बड़ा जरूर है, लेकिन बंदा लगभग पूरे रोल में टेलीफोन पर ही लगा रहता है। कुल मिलाकर बाजी रहती है तापसी पन्नू के हाथ में। पत्थर की मूर्ति जैसा उनका चेहरा और वीडियो गेम जैसे एक्शन दर्शकों को बांधकर नहीं रख पाते। कई लोग कहते है कि यह फिल्म बेबी का प्रीक्वल है। अगर यह बेबी भी है, तो अमेच्योर बेबी। ढाई घंटे की इस औसत फिल्म में चार गाने भी ठूूंसे गए है और प्रेम मोहब्बत के सीन भी। इसमें बदले की कहानी भी शामिल है। न तो कहानी में नयापन है, न कहानी के ट्रीटमेंट में।

ब्लॉगर और पत्रकार अविनाश दास की अनारकली ऑफ़ आरा परंरागत बॉलीवुड फिल्म से अलग और ख़ास है. एक निश्चित वर्ग को यह फिल्म बहुत पसंद आएगी और शानदार निर्देशन तथा अभिनय के लिए याद रखी जाएगी। स्वरा भास्कर का अभिनय तो लाजवाब है ही, अन्य कलाकारों ने भी बेहद स्वाभाविक अभिनय किया है। पूरी फिल्म में स्वरा भास्कर और अविनाश दास छाये हैं--स्वरा पर्दे पर और अविनाश पृष्ठभूमि में। हम बॉलीवुड की फिल्मों के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि अकल्पनीय किस्से-कहानियों और घटनाक्रमों को तो आसानी से पसंद कर लेते हैं लेकिन वास्तविकता के करीब की बातों को पर्दे पर काम पसंद करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि विदेश में जमा काला धन भारत लाने के लिए विद्युत जामवाल को कमांडो बनाकर विदेश भेज दें। क्योंकि ऐसा लगता है कि ब्लैक मनी को वापस लाने की जितनी चिंता नरेन्द्र मोदी को है, उतनी ही विद्युत जामवाल को भी है। सारा काला धन गरीब लोगों के बैंक खाते में आ जाएगा। जो काम नरेन्द्र मोदी नहीं कर सकते, वह हमारा बॉलीवुड का हीरो कर सकता है। कमांडो-2 की कहानी तो यही बताती है। ये हुई ना बात?

भारत एक विवाह प्रधान देश है। यहां विवाह का औसत यूरोप के देशों की तुलना में कम है, लेकिन विवाह के बारे में सोचने और तैयारी करने में ही आम भारतीय की जिंदगी बीत जाती है। बॉलीवुड इसीलिए विवाह, दुल्हन, फेरे जैसे विषयों पर फिल्में बनाता है। बॉलीवुड की फिल्मों का एक जेनर विवाह भी कहा जा सकता है।

रंगून फ़िल्म बनाने में खपी आवश्यक सामग्री
गाने : 33 प्रतिशत
युध्द के दृश्य : 7 प्रतिशत
शाहिद+कंगना के किसिंग सीन : 8 प्रतिशत
कंगना +सैफ के किसिंग सीन : 3 प्रतिशत
पुरानी फिल्मों की मिमिक्री : 18 प्रतिशत
पुराने दौर की छुक-छुक रेल : 6 प्रतिशत
अन्य 25 प्रतिशत सामग्री : विशाल भारद्वाज के स्वादानुसार