kahani-1

कहानी 2 में पिछली कहानी वाली बात नहीं है। दो नम्बर आखिर 2 नंबर ही होता है। जबरन सीक्वल बनाया गया है। विषय गंभीर उठाया गया है, लेकिन कहानी उतनी अच्छी तरह से बुनी नहीं गई है। इंटरवल के बाद तो कहानी अनुमान के अनुसार ही चलती जाती है।

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Zindagi-4

बिना बात सीरियस होना हो, तो यह फिल्म देखने जा सकते हैं। डियर जिंदगी फिल्म बताती है कि हम सब पागल है। हमारे पास अपने लोगों के लिए वक्त नहीं है। हम परफेक्ट रिलेशनशिप की अपेक्षा करते है, जो संभव नहीं है। कोई भी एक रिश्ता परफेक्ट हो ही नहीं सकता। फिल्म यह भी बताती है कि हर टूटी हुई चीज को जोड़ा जा सकता है। इस फिल्म के कुछ संदेश भी है, जैसे चुपचाप घुटघुट कर तकलीफ सहने से अच्छा है, अपने मन के जज्बातों को उजागर कर देना। एक और संदेश यह है कि अपने अतीत को अपने से ब्लैकमेल मत करने दो, वरना वह आपका भविष्य तबाह कर देगा। जीनियस वह नहीं होता, जिसके पास हर सवाल का जवाब होता है, जीनियस वह होता है, जिसके पास हर जवाब तक जाने का धीरज हो। हम बड़ी चीज पाने के लिए नाहक मुश्किल रास्ता खोज लेते है, जबकि आसान रास्तों से चलकर भी बड़ी कामयाबी पाई जा सकती है। जिंदगी के स्कूल में हम सब टीचर ही हैं। पागल वह आदमी होता है, जो रोज-रोज एक ही काम करता है और उम्मीद करता है कि उसके नतीजे अलग-अलग निकलेंगे।

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FORCE-6

टाइम बदल चुका है और देश भी, अब हम प्रोटोकॉल की ज्यादा परवाह नहीं करते, घर में घुसकर मारते हैं। यह किसी नेता के भाषण की लाइन नहीं, फोर्स 2 का एक डायलाग है। एक और डायलाग है- कभी न कभी तो मंत्री को भी देश के काम आना चाहिए। फिल्म के अनुसार रॉ के अधिकारी अपने काम को करने में डिलीजेंस, प्रिपरेशन और होम वर्क तगड़ा करते है। जबकि पुलिस अधिकारी गट फील, एग्रेसन और कॉमन सेंस से काम करते है। निर्देशक ने यह बातें सोनाक्षी सिन्हा और जॉन अब्राहम के मुंह से कहलवाई है। फिल्म तेज गति से आगे बढ़ती है, लेकिन मध्यांतर के बाद थोड़ी सी सुस्त लगती है। फिल्म में जॉन अब्राहम का नाम यशवर्धन है और सोनाक्षी केके यानी कमलजीत कौर है। जेनेलिया डिसूजा भी छोटे से रोल में है। वह सीक्वल के पहले वाली फिल्म फोर्स में जॉन की बीवी बनी थी, जिसकी हत्या हो गई थी। फोर्स 2 उसी को आगे बढ़ाती है। खलनायक के रोल में मर्दानी वाले ताहिर राज भसीन है, जो चीन में रॉ एजेंटों की हत्या के लिए जिम्मेदार है और आगे भी वह 17 अधिकारियों की हत्या की साजिश में लिप्त है।

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shivaay-5

जब अजय देवगन ने अपनी फिल्म शिवाय निर्देशित करने का फैसला किया होगा, तब शायद उन्होंने यहीं सोचा होगा कि अगर मैं इस फिल्म को बनाने के लिए 105 करोड़ रुपए इन्वेस्ट कर रहा हूं, तो क्यों न फिल्म में मैं ही मैं नजर आऊं? इसीलिए फिल्म में केवल अजय देवगन ही अजय देवगन नजर आते है। शिवाय फिल्म अजय देवगन का पर्याय कही जा सकती है। एक बात तो तय है कि यह फिल्म देखने के बाद परिवार के साथ बुल्गारिया जाने वाले लोग दस बार सोचेंगे। इस फिल्म में बुल्गारिया की छवि एक ऐसे देश की बन गई है, जहां बच्चों के साथ अनैतिक कार्य करने का धंधा तो जोरों पर है ही, लोगों को अपह्रत करके उनके अंग निकालकर तस्करी करना और वेश्यावृत्ति कराना भी वहां का प्रमुख कार्य है। एक बात जरूर अच्छी हुई है कि इस फिल्म में बुल्गारिया के भारतीय दूतावास की भूमिका सकारात्मक दिखाई गई है, जिससे और कोई प्रसन्न हो या ना हो, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जरूर खुश होंगी।

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ROCKON-2-2

कितना अच्छा है कि फरहान अख्तर को अजय देवगन वाली बीमारी नहीं है। प्रोड्यूसर होते हुए भी इस फिल्म में वे हीरो जरूर है, लेकिन श्रद्धा कपूर, अर्जुन रामपाल, पूरब कोहली, प्राची देसाई आदि के लिए भी थोड़ी जगह छोड़ी है। वरना शिवाय में जिस तरह अजय देवगन ही अजय देवगन है, वैसे ही इसमें भी फरहान ही फरहान होते। आमतौर पर संगीत पर केन्द्रित फिल्में लोग पसंद करते हैं। रॉक ऑन के 8 साल बाद आई रॉक ऑन-2 भी पसंद की जाएगी। फरहान अब रॉक ऑन-3 की तैयारी में जुुट गए हैं।

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ae-dil-hai-mushkil-1

बहुत दिन बाद ऐसा दृश्य देखने में आया, जब सिनेमा घर के दर्शक फिल्म खत्म होने के पहले ही उठ-उठकर जाने लगे। यह फिल्म एनआरआई लोगों के लिए एनआरआई की कहानियों को लेकर है। इसका नाम होना था - ये फिल्म झेलना है मुश्किल। इसकी कहानी रोमांस-वोमांस पर केन्द्रित नहीं है, यह है सनकी एनआरआई लोगों के एकतरफा प्यार और नफरत की कहानियों की। ए दिल है मुश्किल से ऐसी आशा तो नहीं थी। यह फिल्म बनी ही है अपने निजी जेट विमान में यात्रा करने वाले ऐसे एनआरआई रईसों के लिए, जिनके लिए भारत भी किसी फॉर्मूले फिल्म की तरह है। ये लोग लंदन, पेरिस या वियना में भी हिन्दी में गाना गाते है और विदेशी उसको सुनते और सराहते है। इन करोड़पति आशिकों के लिए नौकरी-धंधा, रोजी-रोजगार, घर-परिवार आदि की अहमियत कुछ नहीं है। ये लोग कुत्तों की तरह झगड़ते भी है और कुत्तों की तरह ही प्यार करने लगते हैं। यहीं कहना चाहते है करण जौहर इस फिल्म में। इमोशन का इतना ज्यादा बघार लगाया है कि दर्शकों को चाहिए कि वह ग्लीसरिन की बोतल साथ लेकर जाए, क्योंकि टसुए बहाते हीरो-हीरोइन को देखकर आपकी आंखों में तो आंसू नहीं आएंगे।

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