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हाफ गर्ल फ्रेंड एक बार देख सकते हैं। 2 घंटे की फिल्म में 50 मिनिट के गाने हैं, लेकिन सुनने में अच्छे हैं, इसलिए अच्छे लगते हैं. एक्टिंग भी ठीक ही है; अश्लीलता, फूहड़पन, दो अर्थवाले संवाद नहीं हैं और गुलशन नंदा छाप कहानी है, जिसे चेतन भगत ने लिखा है। दिल्ली, इण्डिया गेट, संयुक्त राष्ट्र, पटना और न्यू यॉर्क की लोकेशंन्स का उपयोग बुद्धिमत्ता से किया है। बॉस्केटबॉल खेल का अच्छा इस्तेमाल इमोशंस को दिखाने के लिए किया गया है। न्यूयॉर्क में सुबह चार बजे क्लाइमेक्स शूट किया गया है, अच्छा लगेगा।

कौन उल्लू का पट्ठा लेखक आजकल टाइपराइटर पर उपन्यास लिखता हैं? उपन्यास भी रोमन में टाइप करता है और रोमन हिन्दी में ही उसका उपन्यास छपता है ‘चुड़ैल की चोली’। मजेदार बात यह है कि यह लेखक चेतन भगत की तरह इन्वेस्टमेंट बैंकर रहता है, फिर नौकरी छोड़कर उपन्यास लिखने लगता है। इन्वेस्टमेंट बैंकरी के दौरान वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ घूमता है और बॉस का फोन आने पर ऊल-जलूल बहाने बनाता है, जैसे वह कोई सेल्समैन हो। फिल्म के निर्माता निर्देशक लेखक को इस पर भी चैन नहीं मिलता, तो वह हीरो की प्यारी बिन्दु को बायपोलर डिसऑर्डर की मरीज जैसा दिखाता है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि न तो हीरो, न हीरोइन का कोई भी खैरख्वाह यह बात समझा पाता है कि यह बेचारी तो एक तरह की मानसिक बीमारी की शिकार है। पल में तोला, पल में माशा होने वाली हीरोइन को ऐसा दिखाया गया है, मानो वह कोई परी हो। उसकी शादी तय होती है, तब वह दो बार घर से भाग जाती है। तीसरी बार उसका होने वाला पति भाग जाता है। अंत में वह किसी लल्लूू फटाखे से शादी करती है और हीरो को दुखी करके चली जाती है।

जिन लोगों ने बाल ठाकरे को करीब से देखा होगा, वे इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखेंगे कि सरकार 3 के हीरो अमिताभ बच्चन सुभाष नागरे के रोल में कोई ख़ास नहीं जंचे। फिल्म में गरीबों का मसीहा की छवि वाला हीरो, उसके पीछे पड़े गुंडे, बिल्डरों और राजनेताओं का गठजोड़, घर के भीतर की राजनीति, उत्तराधिकारी बनने के लिए किया जानेवाला संघर्ष, जबरन ठूंसी गई हीरोइन, दुबई में अय्याशी करता बिल्डर, गणेश विसर्जन के दृश्य और गणेश वंदना, गोलीबारी, षड्यंत्र आदि सभी फार्मूले हैं, लेकिन फिल्म एकदम सतही जान पड़ती है।

गैंगरेप किसी के लिए दर्दभरी यातना है, तो किसी के लिए फिल्म का मसाला। मातृ ऐसे ही एक गैंगरेप के बाद एक लड़की की हत्या और उसकी मां के इंतकाम की कहानी है। इस विषय पर पहले भी कई फिल्में आ चुकी है। फिल्म में रवीना टंडन के अलावा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है। गैंगरेप, मजबूर लड़की, मजबूर मां, नाकारा पुलिसवाले, भ्रष्ट नौकरशाही, भ्रष्ट मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री का अय्याश लड़का, नशे का कारोबार, गुुंडों के चंगुल में मासूम लड़कियां, मजबूर औरत का इंतकाम, बदला, बदला, बदला कहानी खत्म। औसत गाने, औसत फोटोग्राफी, औसत निर्देशन, औसत से कमतर अभिनय, कमजोर गीत-संगीत, अतार्किक कहानी। इस सबके घालमेल से जैसी फिल्म बन सकती थी, वैसी बन गई, पर दर्शक भी बुद्धिमान है। कई थिएटरों में फिल्म का पहला शो देखने इक्के-दुक्के दर्शक ही पहुंचे और कई शो हुए ही नहीं।

शानदार विजुअल इफेक्ट और डायलॉग्स के लिए बाहुबली-2 देखी जा सकती है। राजा-महाराजाओं की कहानी, क्षत्रीय की जुबान, कटप्पा द्वारा बाहुबली को मारने का राज आदि अन्य कारण हैं, जिनके लिए फिल्म देखी जा सकती है। फिल्म में हिंसा का अतिरेक है और क्रूरतम तरीके से हिंसा दिखाई गई है। हिंसा की तुलना मेंं प्रेम के दृश्य कम है। विजुअल इफेक्ट्स के जरिए युद्ध का वर्णन, शानदार राज-प्रासाद, खूबसूरत झरने, प्राकृतिक नजारे और पानी तथा वायु में तैरता रथनुमा जहाज इतनी सुंदरता से रचे गए है कि वह मन मोह लेते है और दर्शक हिंसा का अतिरेक भूल जाता हैं।

वेश्याओं और तवायफों को लेकर दर्जनों फिल्में अब तक बन चुकी है, लेकिन बेगम जान में वेश्याओं और दलालों का जो महिमा मंडन किया गया है, वह अझेलनीय है। अब तक शायद ही किसी फिल्म में कोठे वाली मौसी को रजिया सुल्तान और रानी पद्मावती बताने की कोशिश की गई हो। यहीं यह फिल्म बचकानी लगने लगती है। बेगम जान बनी विद्या बालन इस फिल्म में दर्जनभर युवतियों, दो खूंखार कुत्तों, दो-तीन दलालों, दो-तीन मुस्टंडों और राजा साहब की चमचागिरी के बूते पर अखिल भारतीय कोठा चलाती है। उसके कोठे में गुजरात से लेकर पंजाब तक की वेश्याएं हैं। उसका कोठा क्या है, पूरी एक सत्ता है। उसकी मर्जी के बिना वहां पत्ता भी नहीं खड़क सकता। वह दिनभर हुक्का पीती, मालिश करवाती, गालियां बकती और अपना महिमा मंडन करती रहती हैं।