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31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए हिन्दू-सिख दंगों को सपाट तरीके से बयान करती है यह फिल्म। इसे करीब 13 महीने पहले रिलीज होना था, लेकिन कई कारणों से और नौ प्रमुख दृश्यों को काटने के बाद ए सर्टिफिकेट मिलने पर यह फिल्म अब जाकर सिनेमाघरों में लगी है। यह कोई कला फिल्म नहीं है। फिल्म के प्रचार के लिए भी कई तरह के हथकंडे अपनाए गए थे, जैसे पंजाब चुनाव में इसका लाभ लेने के लिए सोहा अली खान ने कुछ सिख संगठनों के साथ मोमबत्ती जुलूस निकाला था। फिल्म में जगदीश टाइटलर से मिलते-जुलते किरदार को भी दिखाया गया है, जो सिखों के खिलाफ हिन्दुओं को भड़काता है। गनीमत यह है कि फिल्म में कुछ ऐसे हिन्दू चरित्र भी रखे गए है, जो अपनी जान को जोखिम में डालकर सिख परिवारों को बचाने में लगे थे।

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गांधीजी व्यक्ति नहीं, विचार थे और अण्णा हजारे एक व्यक्ति हैं। गांधीजी पूरा भारतवर्ष थे और अण्णा हजारे रालेगांव सिद्धि। गांधीजी ने जो कुछ किया वह बेहद सुविचारित और लक्ष्यकेन्द्रित था। अण्णा हजारे के साथ ऐसा नहीं है। गांधीजी झंडा लेकर आगे चलते थे और पूरा देश उनके पीछे। अण्णा हजारे भी झंडा लेकर आगे-आगे चले, लेकिन उनके पीछे जो लोग थे, उनमें से कई ने उनके नेतृत्व को धता बता दी। गांधीजी बेरिस्टर थे और उस दौर की दुनिया की सबसे बुद्धिमान माने जाने वाली हस्तियां उनके संपर्क में थी। टैगोर से लेकर चार्ली चेप्लिन तक। अण्णा के साथ अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी जैसे लोग थे, जो मतलब निकलते ही छिंटक गए। गांधीजी अपनी हत्या के 68 साल बाद भी जीवित है और हमारे नेताओं के लिए आज भी एक बेशकीमती ‘कमोडिटी’ हैं। अण्णा हजारे को आज उन्हीं के लोगों ने दरकिनार कर दिया। गांधीजी के जीवन और उनके कार्यों पर बनी फिल्में आज भी सुपर-डुपर हिट होती है और ऑस्कर जीतती हैं। दुनिया के बेहतरीन फिल्मकार उनके पीछे भागते रहे, अण्णा के साथ शायद ऐसा नहीं है।

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'मिर्ज्या' फिल्म 'फितूर' जैसी फिल्म का अगला संस्करण है । राकेश ओमप्रकाश जी महान प्रेम कहानी फिल्माना चाहते होंगे, पर जो बना है, वह बेहद पकाऊ और सिर दुखाऊ है। क्या उन्हें किसी डॉक्टर ने कहा था कि 2 घंटे 10 मिनट की फिल्म में 15 गाने ठूंस देना?ढोल कितना भी पीटो, अंदर से पोल ही है. अब सांवरिया या फितूर जैसी फिल्मों की तरह इसे भी झेलना आसान नहीं.

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संगीत को आधार बनाकर कई फिल्में बनी है, जिनमें सबसे घटिया फिल्म कही जा सकती है बैंजो। गणपति बप्पा और शिर्डी के सांई बाबा के गाने भी इस फिल्म को फ्लॉप होने से नहीं रोक सकते। गणपति बप्पा और सांई बाबा को लेकर आखिर कोई कितनी इमोशनल हो? जैसे कोई खीर बनाने बैठे और उसमें भरपूर अदरक, लहसुन और हींग का बघार लगा दे, ऐसी ही है बैंजो। देखने जाओ तो फिल्म के समापन की दुआ करो। तमाम मसालों के बाद भी उबकाई ही आती है। रितेश देशमुख को लगता है कि अब वे सुपर हीरो बनने के लायक हो गए हैं। आपके पिताजी बड़े नेता थे, आप जेनेलिया से शादी कर चुके, तो क्या सुपर हीरो हो गए? संगीतमय फिल्म के नाम पर भड़भड़कूटा कितना झेलें?

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अगर आपकी रूचि क्रिकेट में बिलकुल नहीं है, तब भी एम.एस. धोनी की अनकही कहानी को देखने जा सकते है। फिल्म देखनीय है। धोनी के जीवन पर बनी इस फिल्म में कोई भी खलनायक नहीं है। कई फिल्मों में वक्त को खलनायक दिखाया जाता है, लेकिन यहां वक्त भी खलनायक नहीं है। खेल के नाम पर भीतरी राजनीति को उभारा जाता है, वह भी यहां नहीं है। यह एम.एस. धोनी पर बनी रोमांटिक बॉयोपिक है। जिसमें सबकुछ स्वाभाविक ढंग से चलता रहता है। सारे दृश्य ईमानदारी से चित्रित किए गए लगते है और स्वाभाविकता के एकदम करीब। धोनी के जीवन से जुड़े अनेक विवादास्पद मुद्दों को गायब कर दिया गया है और टीम इंडिया के अन्य खिलाड़ियों के लिए इसमें कोई खास जगह नहीं है। माही और साक्षी की प्रेम कहानी के अलावा इसमें माही के पहले प्रेम प्रसंग को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। फिल्म बताती है कि एम.एस. धोनी में जोखिम उठाने का माद्दा है, नेतृत्व की क्षमता है, अपनी बातों पर दृढ़ रहने की शक्ति है, वह सकारात्मक है और प्रतिभा तो है ही। इन सब कारणों से तीन घंटों से भी लंबी फिल्म दर्शनीय बन गई है।

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'नो' केवल एक शब्द नहीं है। यह अपने आप में पूरा वाक्य है। 'नो' मतलब नहीं। नहीं के आगे कुछ नहीं, पीछे भी कुछ नहीं। यह पिंक फिल्म का यादगार डॉयलॉग है। बहुत मायने हैं इसके। फिल्म हटकर है।अगर आप मस्ती या मनोरंजन के लिए फिल्म देखते हैं तो 'पिंक' मत देखिए, क्योंकि यह अलग फिल्म है। यह आपको झिंझोड़कर रख देगी। शायद इसीलिये यह फिल्म अच्छा बिजनेस करेगी। अगर कभी आपको पुलिस थाने या कोर्ट-कचहरी जाना पड़ा हो तो लगेगा कि आपकी अपनी कहानी है।वहां कैसे पीड़ित पक्ष अपराधी दिया है और अपराधी को पीड़ित पक्ष। फ़िल्म में मसाले झोंकने की अनंत संभावनाओं के बाद भी फालतू मसाले नहीं डाले गए हैं, केवल जरूरत के मसाले जरूर हैं.

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