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तिग्मांशु धूलिया को लगता है कि भारत के तमाम पुराने राजा-रजवाड़े कोढ़ हैं। वे अय्याशी, षड्यंत्र, छल-कपट के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते। हर एक की कई-कई बीवियां और कई-कई रखैलें होती हैं और भाई-भाई को, पत्नी-पति को, पति-पत्नी को, बाप-बेटे को मरवाने के षड्यंत्र में लगे रहते है। इससे समय बचे तो ही बेचारे बचा-खुचा समय कोर्ट-कचहरी और जेल जाने में खर्च कर पाते है। लगता है तिग्मांशु धूलिया खुद इस डायलॉग का मतलब भूल गए कि जब नाम के अलावा कुछ न बचा हो, तो नाम को बचा-बचाकर खर्च करना चाहिए।

फिल्म धड़क को मराठी की सुपरहिट फिल्म सैराट का रीमेक समझकर न देखें। न शुद्ध मुंबइयां फिल्म है, जिसका कोई संदेश नहीं है। कहानी में भी बदलाव किया गया है और सैराट जिन मुद्दों को लेकर चर्चित हुई थी। वे मुद्दे इस फिल्म में एक-दो डायलॉग तक सीमित है। सैराट में वर्ग और जाति व्यवस्था पर चोट थी। इस फिल्म में ओनर किलिंग का बहाना बना दिया गया है।

दो सप्ताह पहले संजय दत्त पर बनी बायोपिक संजू रिलीज़ हुई थी, इस सप्ताह हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह के जीवन पर बनी बायोपिक सूरमा रिलीज हुई है। दोनों बायोपिक एक दूसरे के विपरीत है। संजू में जहाँ एक नशेड़ी, आवारा और कानून का मखौल उड़ानेवाले व्यक्ति का महिमामंडन था तो सूरमा में एक संघर्षशील हॉकी खिलाड़ी की कहानी है, जो पंजाब के एक साधारण परिवार से है और उसमें अपने आप के लिए, परिवार के लिए और देश के प्रति प्रतिबद्धता नज़र आती है।

रेस-3 के अंत में बता दिया गया है कि रेस अभी खत्म नहीं हुई है, यह जारी रहेगी, लेकिन उस रेस में कौन कौन दौड़ेगा, यह राज रखा गया है। रहस्य, रोमांच, ट्विस्ट, नाच गाना, हीरो और हीरोइन दोनों का अंग-प्रदर्शन, डब्ल्यूडब्ल्यूई की तरह जैकलिन और डैसी शाह की कुश्ती, कार रेस, धूम की तरह बाइक रेस, 10 गाने, मिक्स मार्शल आट्र्स और न जाने क्या-क्या है? यह फिल्म थ्रीडी में भी है और अगर थ्रीडी में देखे, तो लगता है कि आप कोई वीडियो गेम का हिस्सा हैं।

हाथों की लकीरें भी गजब होती हैं - रहती तो मुट्ठी में हैं, पर काबू में नहीं रहती। यह संवाद सोच-समझकर संजू फिल्म में रखा गया होगा। परेश रावल और रणबीर कपूर की शानदार एक्टिंग के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है। 47 साल की मनीषा कोइराला 58 साल के संजय दत्त की मां की भूमिका में हैं और अगर आपको यह देखना हो कि अगर आपके पास बेशुमार दौलत हो, तो कोई नशेड़ी, गंजेड़ी, भंगेड़ी, वेश्यावृत्ति का आदी, व्यभिचारी भी कहानी के बूते पर सहानुभूति खरीद सकता है।